Thursday, January 28, 2010
कैसे सफल होगी हरित क्रांति
देश में खाद्यान्न संकट के कारण महंगाई की स्थिति बेकाबू हो रही है। सिर्फ अनाज ही नहीं दाल, सब्जी, चीनी सभी की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में कृषि मंत्रालय अनाज की जगह फूल के उत्पादन पर जोर दे रहा है। जिस देश में आधी आबादी गांव में रहती है जहां खेती प्रमुख व्यवसाय है, जहां 37 फीसदी लोग गरीब हैं, भूख से जहां लोगों की जान जाती है। उस देश में सिर्फ फूलों की खेती कुछ हजम नहीं होती। हमारे देश में गेंहू, चावल और चीनी की अच्छी पैदावार होती है। इसे झांकी में दिखाये जाने की जरूरत थी। जिससे इसे बेहतर बनाने की कोशिश हो सके । राष्ट्रपति के बयान और कृषि मंत्रालय के झांकी में विरोधाभास है। ऐसे में हरित क्रांति कैसे सफल होगी इस पर देश को सोचने की जरूरत है।
Wednesday, January 20, 2010
आगरे का सफर सुहाना भी,यादगार भी
साल 2009 का आखिरी दिन। दोस्तों में बहस हुई कहां जाए,क्या करें,कैसे नये साल का स्वागत करें। काफी सोच-विचार के बाद आगरा जाने का कार्यक्रम बना। मैं मुनिरका और मेरे दोस्त बदरपुर से सराय काले खां पहुच गये। वहां उत्तरप्रदेश परिवहन निगम की एक बस हमारा इंतजार कर रही थी। बस की स्थिति देखकर सफर का आभास हो गया। कंडक्टर ने कहा बस ननस्टॉप है। थोड़ी देर में हम बस में सवार हो गये।
दिल्ली से निकलने में ही बस को घंटों लग गये। फिर बीच-बीच में सवारियों का आना जाना जारी रहा। किसी तरह पलवल के पास देह-हाथ सीधा करने का मौका मिला। कुरकुरे और चना-मसाला खाकर कुछ नहीं हुआ तो पराठा खाने का विचार आया।
बस वहां से चल पड़ी। हमलोगों ने बस में ही खाना शुरू किया। संतोष ने कहा-कितने का पराठा है। पराठा की कीमत सुनते ही सभी एक-दूसरे को देखने लगे। दाम सुनकर ही पेट भर गया। 15 रूपये का एक पराठा खाने के बाद रास्ते में कुछ और खाने की हिम्मत नहीं हुई। लेकिन 3 बजते-बजते सब्र टूट गया। बस के ट्रांसपोर्ट नगर पहुंचते ही एक महाशय आ धमके। उनके प्रस्ताव लुभावने लगे। उन्होंने 500 रूपये में आगरा घुमाने का ऑफर दिया। थोड़ी खींचतान के बाद 400 रूपये पर सहमति बनी। नया शहर, अजनवी लोग कम समय होने से उस महाशय के प्रस्ताव हमने मान लिये। खाने की बात पर फिर बहस हुई। एक रेस्टोरेंट के सामने ऑटो रूकी। रेस्टोरेंट का इनटीरियर देख ठगे जाने का अनुमान हो गया। वहां लगे शीशे में अपनेआप को देखकर हमलोगों ने चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की। एक अंकल जैसे वेटर ने प्रेम से मेन्यू पेश किये। आंखे व्यंजन के नाम की जगह उसके कीमत पर ऊपर-नीचे होने लगे।
यहां दोस्तों में बहस नहीं हुई। इशारों-इशारों में मेरी पसंद पर सबने मुहर लगा दी। साठ रूपये की दाल और अस्सी रुपये की सब्जी से किसको आपत्ति हो सकती थी। असल में इससे कम का कुछ था ही नहीं। सकुचाते-सकुचाते हमने बीस रोटियां खा ली। 5 रूपये की तंदूरी रोटी से पहली बार वास्ता पड़ा था।मन में बील का कलकुलेशन भी चल रहा था। डर भी था कि सलाद का दाम भी न जोड़ लिया जाए। ऊपर से वेटर की सेवा भावना के कारण दस रूपये भी देने पड़े।
लालकिला में टिकट की लंबी लाइन देखकर अंदर जाने का विचार त्याग दिये। वहां से हमलोग आगरा के लिए गये। रास्ते में ऑटो वाले ने हमें खैराती मुहल्ला दिखाया। यहां मुगल बादशाह शाहजहां खैराती का आयोजन करता थे। ताजमहल के पूर्वी गेट से हमलोगों ने प्रवेश किया। इस बीच ताज की हर खुबसुरती को कैमरे में सहेजने का काम जारी था। नोकिया 2700 मोबाइल ने भरपूर साथ दिया। देश के अलग-अलग प्रांत से आये लोगों और विदेशी सैलानियों को एक साथ देखना बहुत अच्छा लग रहा था।
शाम हो रही थी। अंधेरा घिर चला था,लेकिन ताज की खूबसूरती और इसकी चमक अदभूत था। संगमरमर के पत्थरों से छिटक रहे प्रकाश को देखना मनोनम था। नव वर्ष की इस संध्या का नजारा वहां आये प्रेमी-युगल के लिए बेहद खास होगा। मन में हजार तरह के सपने संजोये प्रेमी अपनी प्रेमिका में मुमताज महल को देखते हैं। एक-दूसरे के गले में बाहें डाले ये प्रेमी-युगल साथ रहने के कई सारे वादे करते हैं। ताज की बनावट और उसके लोकेशन को देखकर मन गदगद कर रहा था। मानो संगमरमर की सफेदी और चमक चांद का मुहं चिढ़ा रहे हो।
वापसी में एक यादगार लम्हा हमारा इंतजार कर रहा था। अंधेरा पूरी तरह घिर चुका था। शाम के 6 बजे का वक्त था। सीढ़ीयों से उतरने के बाद हमने पाया कि हमारे दो जोड़ी जूतें गायब थे। इधर-उधर तालाशी अभियान शुरू हो गया। खाली पैर लौटने से गलत नंबर के जूते में ही लौटना पड़ा। अमित और हेमंत दोनों जूते खोने के बाद एक-दूसरे पर दोष मढ़ रहे थे। दोनों में बहस लगातार तेज हो रही थी। उदास मन से हमलोग फिर से उत्तरप्रदेश परिवहन निगम की बस में आ धमके। संतोष ने माहौल को हल्का बनने के लिए अपन नोकिया एन-72 मोबाइल पर गाना प्ले कर दिया। थोड़ी देर में माहौल शांत और वापसी का सफर शुरू हो गया।
Wednesday, November 18, 2009
हमारी क्लास के बुद्धिजीवी पत्रकार ?
हमारी क्लास के कुछ छात्र ऐसे हैं जो अपने आप को वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में रखते हैं। इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। उनलोगों में एक बड़ा पत्रकार बनने के कई सारे गुण है,लेकिन उस गुण को कैसे निखारा जाए ये कला उनको नहीं आती। ये छात्र अपने-आप में इतने मगन होते हैं कि बाकी छात्र-छात्राओं को वे मजाक का विषय समझते हैं।
समाज कल्याण, नारी स्वतंत्रता और आम आदमी की सदा दुहाई देने वाले ये पत्रकार क्लास में ही अपनी बात को झुठा साबित कर देते हैं। जब कोई लड़की क्लास में कुछ बोलना चाहती है, किसी बात का विरोध करना चाहती है तो इन बुद्धिजीवी पत्रकारों के सत्ता पर संकट मंडराने लगता है। मैं इसे कमजोर मानसिकता का ही एक रूप मानता हूं। हमारे प्रधान सर कहते हैं कि सबको अपनी बात कहने का हक़ है। हमें सभी को सुनना चाहिए। किसी से हमारी असहमति हो सकती है इसके बावजूद उसे अपनी बात पूरी करने की आज़ादी है। लेकिन इन बातों का हमारी वरिष्ठ बिरादरी पर कोई असर नहीं होता।
क्लास में कुछ छात्र-छात्रा चुप रहते हैं। उनके चुप रहने का कारण उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि होती है। उनको बचपन से कुछ कहने कुछ बोलने से रोका जाता है। ऐसे छात्रों को क्लास में सहयोग, समर्थन और प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। उन्हे उम्मीद होती है कि क्लास में दोस्ताना माहौल मिलेगा, लेकिन यहां तो गुटबाजी शुरू हो जाती है।
Thursday, November 5, 2009
मीडिया को सलाम नमस्ते !
इसी बैच की मीनाक्षी के विचार इन दोनों से अलग हैं। इनका मानना है कि पत्रकारिता में आने के बाद अपनी निजी जिन्दगी को भूल जाना होता है। यह दूसरे पेशों से ज्यादा चुनौतीपूण और रोमांचक है। इसमें हमेशा सगज रहने की जरूरत होती है। अगर ईमानदारी से मेहनत की जाए तो बहुत अच्छा करियर विकल्प है जिसमें नाम, शोहरत और पैसा तीनों हैं।
मीडिया को अलविदा कहने वालों में रजनीश प्रताप सिंह भी हैं जो रेडियो टीवी के छात्र हैं। शुरूआती नौकरी ‘आज तक’ जैसे बड़े संस्थान में करने के बाद भी इनको वहां करियर दिखाई नहीं पड़ा। आज ये प्रशासनिक सेवा का हिस्सा बनना चाहते हैं। संस्थान के कुछ छात्रों का मानना है कि टेलीविजन में काम करना स्टेनो टाइपिस्ट का काम करना हो गया है। वहीं समाचार पत्र का काम सिर्फ अनुवाद तक सिमट कर रह गया है।
ऐसे छात्रों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है जिनका संस्थान से निकलने के बाद मीडिया से मोहभंग हो जाता है। यह चिन्ता का विषय है। बड़ा सवाल है कि सरकार यहां प्रत्येक छात्र पर सलाना लगभग चार लाख रूपये खर्च करती है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने में अपनी भूमिका अदा करेंगे।
Wednesday, November 4, 2009
साधु जी की मोटी बातें........
मैं सीधु जी को पिछले दस सालों से जानता हूं।तब मैं स्कूल की पढाई पूरी कर रहा था। तब वे रोज सुबह गली-गली घूमकर लोगों को जगाने का प्रयास किया करते थे। वे कहा करते थे –रोज अपने माँ-बाप के चरण छुओ, किताब तुम्हारा सबसे अच्छा मित्र है हमेशा किताब के साथ रहो....। उनकी बातों को तब हमें विनेदी लगती थी। कभी कभी हम दोस्तों के बीच वे हंसी का पात्र बनते थे। वे अक्सर कहा करते थे कि बेटा-बेटी में कोई अंतर नही है। बेटियों को भी पढ़ने लिखने का हक है। परिवार में भाभी का दर्जा मां जैसी होना चाहिए। उनकी बातें मुझे आज सार्थक लगती है। आज जिस प्रकार युवाओं में अपने माता-पिता, दादा-दादी और गुरूजन के प्रति सम्मान कम हो रहा है, वह चिन्ता का विषय है। एक बेहतर जीवन और समाज बनाने में उनकी एक एक बातें मुझे अब मुल्यवान लगती है । साधु जी आजकल दिल्ली के बुराड़ी में रह रहे हैं और अपने पोते पोतियों का संस्कार बनाने में कार्यशील हैं। उनके बच्चों को अच्छा नही लगता है कि वे इस उम्र में काम करे। लेकिन साधु जी के लिए आराम हराम है। अस्सी साल के साधु जी का जीवन किसी तपस्या से कम नही है।
Wednesday, October 7, 2009
दीदीसी को मिली एक और जिम्मेदारी……………
कहने को दीदीसी का परिवार बहुत बड़ा है । सामाजिक प्रतिषेठा भी है। पैसे की भी कोई कमी नही है लेकिन कैसे कटता है दीदीसी के दिन इसे कोई नही समझ सकता। माँ बाप के गुजरने के बाद अपनी बहनों को कभी इसकी कमी महसूस नहीं होने दी। बड़ी बहन की पहले ही शादी हो चुकी है।अब तक घर की पूरी जिम्मेदारी दीदीसी पर थी। छोटा भाई और दो छोटी बहने यही उसका वास्तविक परिवार है। बाकी सब नाम के है। इस छोटे से परिवार की परवरिश में दीदीसी ने कभी अपने बारे में नहीं सोचा। आज भी उसकी सबसे बड़ी चिन्ता इस परिवार के लिए है।
दीदीसी से हमारी मुलाकात आज से दो साल पहले जिया सराय में हुई थी। वह रोज करीब तीन घंटा सफर कर के क्सास के लिए आती थी। क्लास के बाद उसे घर पहुँचने की जल्दी होती थी। कहती थी- पता नही बच्चों ने खाना खाया या नहीं । घर की सारी जिम्मेदारी दीदीसी पर थी। चाहे उनको खिलाने की जिम्मेदारी हो पढ़ाने की या फिर घर के केस मुक़दमों की। सभी काम पूरी तत्परता से करती थी। वह चाहती थी कि पहले जमीन का विवाद सुलझ जाय फिर शादी करेगी। लेकिन घर वालों ने उसकी एक न सुनी। समाज की नजर में इस परिवार की जिम्मेदारी उसके ताऊ जी पर थी। उनको इस बोझ से छुट्टी लेना था।
दीदीसी को आज ससुराल के रूप में एक और जिम्मेदारी मिली। उसे खुश होना चाहिए लेकिन वह चिंतित है। अब उसे पति सास ससुर और देवर ननद के रिश्ते को समझना होगा। लेकिन सवाल है कि जिन भाई बहनों को वह एक पल भी अपने से दूर नहीं होने देती थी उसके बिना कैसे रह पायेगी ? इससे भी बड़ा सवाल है कि उसके भाई बहन कैसे रहेंगे दीदीसी के बिना ?.....................
Monday, October 5, 2009
सबसे अच्छी चीज जो मैं भूल गया........
बचपन में मैं एक कव्वाली गाया करता था –हम घर से चले किताब ले स्कूल का रास्ता भूल गये। आज मैं दीदीसी की शादी गया। वहां का इंतजाम देखकर मैं स्तब्ध था। शादी का ऐसा भव्य सेट देखकर मैं पहली बार देख रहा था। बचपन की वो कव्वाली मुझे फिर याद आई। सभी अपने अपने तरीके से शादी का आनंद ले रहे थे। कोई मस्ती में भंगड़ा कर रहा था कोई मेहमानो का स्वागत को तैयार था। कोई खाने पीने की व्यवस्था कर रहा था तो किसी पर शादी को सुचारू रूप से कराने की जिम्मेदारी थी ।
मैं गजेन्द्र के साथ फोटोग्राफी कर रहा था। रूबी के बाउ जी भी हमारे साथ थे। पहली सबसे अच्छी बात बाउ जी को दीदीसी से मिलाने की थी जो मैं भूल गया। दूसरी अच्छी बात जीजीसा से मुलाकात करना याद नही रहा। कव्वाली यहीं पूरी नही हुई। शादी हो रही थी मंत्रोचारण पढ़े जा रहे थे। सिन्दूर दान का समय आया और मैं फोटो लेना भूल गया। विधिवत शादी संपन्न हुई दूल्हा दूल्हन ने खाना खाया। दीदीसी की विदाई का वक्त आया और मैं वहां नही था। -- Akash Kumar