एक सवाल मन को परेशान करता है...उस सवाल का यूं परेशान करना जायज भी है....क्योंकि जिंदगी खा पी कर चले जाने का नाम नहीं है....इसका एक मकसद होता है...ये मकसद सभी के लिए अलग अलग होता है...कभी कभी दो लोगों का मकसद एक हो सकता है....ये मकसद छोटा और बड़ा भी होता है....किसी का मकसद देश का प्रधानमंत्री बनने का तो किसी का दुनिया का सबसे ज्यादा पैसे वाला आदमी बनने का हो सकता है....ये उसकी क्षमता और महत्वकांक्षा पर निर्भर करता है...अगर सिकंदर की महत्वकांक्षा पूरी दुनिया पर राज करने की थी....तो ये उसकी क्षमता और उसका विजन था....उसी तरह अगर किसी का मकसद अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाने की है तो बहुत बड़ा हाथ उसकी क्षमता और महत्वकांक्षा का है.....अब यहां एक सवाल उठता है कि कौन नहीं चाहता कि उसके पास ढ़ेर सारा पैसा हो....कौन नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे दुनिया के सबसे अच्छे संस्थान से पढ़ाई करे...लेकिन ये उसका सपना होता है...ये उसकी इच्छा होती है...मैं कहुंगा कि मकसद और सपना में फर्क है....और कोई मामूली फर्क नहीं है...सपना मेरा हो सकता है कि मैं ऑफिस मारूती इस्टीम में जाऊं....लेकिन मेरा मकसद ये नहीं है कि मेरे पास ढ़ेर सारा पैसा और महंगी गाड़ी हो....सपना हो सकता है कि मेट्रो सिटी में एक शानदार मकान हो...लेकिन मकसद ये नहीं है...मकसद तो गांव में एक छोटे से घर में रहने की है...जहां खिड़की से ताजा हवा का झोंका हर रोज चेहरे से आकर टकराये...जहां सूरज की पहली किरण खिड़की के रास्ते मेरा माथा चूमे....अब सबसे अहम सवाल कि जब मुझे मेरा मकसद पता है तो देश की राजधानी में क्या कर रहा हूं...तो इसका जवाब मेरे पास है....यहां मीडिया के अलग-अलग ट्रेंड और नये रूप से दो चार हो रहा हूं.....क्योंकि आने वाले दिनों में रिजनल मीडिया का बोलबाला होगा....आज जो खबरें धड़ल्ले से बिकती हैं...उसकी टीआरपी कम होने वाली है....और जो वास्तव में खबर होती है...जिसका नाता मास से होता है...वैसी खबरें ही दिखायी सुनाई और छपी होंगी.....ऐसे में मेरा मकसद दूर गांव में रहकर पत्रकारिय जीवन का निर्वाह करना है..तो क्या ये गलत है ?
Saturday, October 9, 2010
Tuesday, August 24, 2010
ये हमारे देश में क्या हो रहा है ?
ये अपने देश में क्या हो रहा है?….बात झारखंड से शुरू करते हैं...जहां के लगभग 2 हजार किसानों ने अपनी जिंदगी से तंग आकर सुप्रीम कोर्ट से मौत की मांग कर दी...बुदेंलखंड में लोग घास की रोटी खाने को मजबूर है...जहां हो रही मौत की खबर राष्ट्रीय पटल पर नहीं आ पाती....ऐसे नाजूक हालात में भी माननीय सांसद अपना वेतन बढ़ाने में लगे हैं...और बेशर्मी देखिए...वेतन में तीन सौ फीसदी की बढ़ोतरी भी उन्हे कम लग रहा है....वहीं दूसरी औऱ दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने गरीबी की एक नई परिभाषा दे दी है...जिसमें 70 रूपये प्रतिदिन कमाने वाले लोग गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते....
आज आम गरीब लोगों की जान इतनी सस्ती हो गई है...कि सैकड़ों लोगों की मौत की चीख तबतक सुनाई नहीं पड़ती...जबतक पूरे देश में सरकार की थू थू नहीं होने लगे...बंगलौर शिविर में भी तो यही हो रहा है...लोग बदहाली में जान दे रहे हैं लेकिन सरकार इसे सामान्य मौत बता कर कन्नी काट रही है.....ऐसे में अगर कोई आदमी तंग आकर हथियार उठा लेता है...तो हम एक साथ उसे गलत करार दे देते हैं...मैं भी उसे पूरी तरह सही नहीं मानता...लेकिन उसके मन में घर कर रहे असंतोष को समझने की जरूरत है...क्योंकि ये असंतोष देश के करोड़ो मन में बारूद का रूप ले रहा है...
आज आम गरीब लोगों की जान इतनी सस्ती हो गई है...कि सैकड़ों लोगों की मौत की चीख तबतक सुनाई नहीं पड़ती...जबतक पूरे देश में सरकार की थू थू नहीं होने लगे...बंगलौर शिविर में भी तो यही हो रहा है...लोग बदहाली में जान दे रहे हैं लेकिन सरकार इसे सामान्य मौत बता कर कन्नी काट रही है.....ऐसे में अगर कोई आदमी तंग आकर हथियार उठा लेता है...तो हम एक साथ उसे गलत करार दे देते हैं...मैं भी उसे पूरी तरह सही नहीं मानता...लेकिन उसके मन में घर कर रहे असंतोष को समझने की जरूरत है...क्योंकि ये असंतोष देश के करोड़ो मन में बारूद का रूप ले रहा है...
Monday, August 9, 2010
सवाल देश की इज्जत का
“दुअरा" पर आयेल बरात तअ समधी के लागल हगास”…......वाली बात राष्ट्रमंडल खेल के लिए बिल्कुल फिट बैठती है.....इसका आयोजन 3 अक्टूबर से 14 अक्टूबर तक होने वाला है
यानी लगभग 50 दिन और बच रहे हैं....शहर के हालात देख कर ऐसा लगता है....जैसा सारा काम एक दिन में पूरा कर लिया जाएगा...यानी समय कम है और काम ज्यादा...
काम ज्यादा होने से और इसे समय पर पूरा करने के दबाव में पुख्ते काम की गारंटी
नहीं दी जा सकती....ऐसे में एक और कहावत याद आ रहा है....”हड़बड़ी के बिआह कनपटी में सेनूर”....मुख्यमंत्री का अल्टीमेटम मिल चुका है कि एक सितम्बर से पहले काम खत्म कर देना है...ऐसे में निर्माण कार्य में लगे कंपनियों ने रफ्तार तेज कर दी है
हो भी क्यों ना सवाल देश की इज्जत का जो है
इसकी वजह से जो काम 100 रूपये में होने वाला था...उसे 200 रूपये देकर पुरा किया
जाएगा...ये पैसा आएगा आपकी औऱ हमारी जेब से.....क्योंकि “हम आम आदमी के जेब में ही तो देश का सारा पैसा पड़ा है”...सरकार जब चाहती है निकाल लेती है...अलग-अलग तरीक से.....
यानी लगभग 50 दिन और बच रहे हैं....शहर के हालात देख कर ऐसा लगता है....जैसा सारा काम एक दिन में पूरा कर लिया जाएगा...यानी समय कम है और काम ज्यादा...
काम ज्यादा होने से और इसे समय पर पूरा करने के दबाव में पुख्ते काम की गारंटी
नहीं दी जा सकती....ऐसे में एक और कहावत याद आ रहा है....”हड़बड़ी के बिआह कनपटी में सेनूर”....मुख्यमंत्री का अल्टीमेटम मिल चुका है कि एक सितम्बर से पहले काम खत्म कर देना है...ऐसे में निर्माण कार्य में लगे कंपनियों ने रफ्तार तेज कर दी है
हो भी क्यों ना सवाल देश की इज्जत का जो है
इसकी वजह से जो काम 100 रूपये में होने वाला था...उसे 200 रूपये देकर पुरा किया
जाएगा...ये पैसा आएगा आपकी औऱ हमारी जेब से.....क्योंकि “हम आम आदमी के जेब में ही तो देश का सारा पैसा पड़ा है”...सरकार जब चाहती है निकाल लेती है...अलग-अलग तरीक से.....
Monday, August 2, 2010
कल का अच्छा आज है बुरा !
अच्छा आदमी किसे कहते हैं ये आज तक मुझे समझ नहीं आया…लेकिन जो बेसिक परिभाषा मैं बचपन से सुनता आया हूं...उसके मुताबिक अच्छे आदमी की परिभाषा गढ़ी जा सकती है...लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये परिभाषा हर काल खंड में सार्थक हो...जैसे अगर हम मानते हैं कि शराब पीना बुरी बात है...लेकिन क्या ये हमारे इलीट क्लास के कल्चर का हिस्सा नहीं है ?
क्या लोग इसे पीने के बाद खुद को हाई क्लास नहीं मानते ? यानी शराब पीना अब गलत काम नहीं रहा..क्योंकि आज ये सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है...ये छोटे शहरों कस्बों से निकल कर सूदूर गांव तक पहुंच गया है...अब तो गांव में भी जो लोग बीयर नहीं पीते उसे पिछड़ा और पुराने ख्यालात वाला समझा जाता है...
लगभग यही हाल लड़कियों के मामले में भी फिट बैठता है...जिसके पास कोई गर्लफ्रेंड नहीं है उसे असफल और बेवकूफ समझना आम बात हो गयी है॥ हैरान तो लोग उस पर भी है जो सिर्फ एक लड़की के साथ है...और उसके सिवा किसी के बारे में सोचता भी नहीं है....
ये बात यहीं खत्म नहीं होती...मां बाप की आज्ञा मानने वाला, टीचर को इज्जत देने वाला, दोस्तों की मदद करने वाला आदमी.... आज की नयी परिभाषा में अच्छा आदमी नहीं है...साफ शब्दों में कहें तो आज जो बाहरी तौर से स्मार्ट दिखे, जो जिंदगी में कपड़ों की तरह लड़कियां बदलता हो...देर रात बार में पार्टी करता हो औऱ जो रिश्तों को मजबूरी समझता हो, वही अच्छा आदमी है...
क्या लोग इसे पीने के बाद खुद को हाई क्लास नहीं मानते ? यानी शराब पीना अब गलत काम नहीं रहा..क्योंकि आज ये सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है...ये छोटे शहरों कस्बों से निकल कर सूदूर गांव तक पहुंच गया है...अब तो गांव में भी जो लोग बीयर नहीं पीते उसे पिछड़ा और पुराने ख्यालात वाला समझा जाता है...
लगभग यही हाल लड़कियों के मामले में भी फिट बैठता है...जिसके पास कोई गर्लफ्रेंड नहीं है उसे असफल और बेवकूफ समझना आम बात हो गयी है॥ हैरान तो लोग उस पर भी है जो सिर्फ एक लड़की के साथ है...और उसके सिवा किसी के बारे में सोचता भी नहीं है....
ये बात यहीं खत्म नहीं होती...मां बाप की आज्ञा मानने वाला, टीचर को इज्जत देने वाला, दोस्तों की मदद करने वाला आदमी.... आज की नयी परिभाषा में अच्छा आदमी नहीं है...साफ शब्दों में कहें तो आज जो बाहरी तौर से स्मार्ट दिखे, जो जिंदगी में कपड़ों की तरह लड़कियां बदलता हो...देर रात बार में पार्टी करता हो औऱ जो रिश्तों को मजबूरी समझता हो, वही अच्छा आदमी है...
Sunday, August 1, 2010
ये दुर्घटना ही थी....
बारिश के बहाने आपने अब तक कई सारे काम किये होंगे….कुछ अच्छे कुछ बुरे...कुछ सोचे कुछ बिना सोचे...उनमे बहुत कुछ आप भूल गये होंगे मैं भी भूल जाता हूं....लेकिन कुछ ऐसी घटना और दुर्घटना भी हो जाती है...जिसे हम कभी भूल नहीं पाते...ऐसी ही एक दुर्घटना पिछले शनिवार यानी 31 जुलाई को हो गई...इसे मैं पूरी तरह दुर्घटना मानता हूं....लेकिन इसमें मेरा नुकसान नहीं हुआ उल्टे फायदा ही हुआ...लेकिन मानवता के नाते इसे मैं अपना नुकसान ही मानता हूं....
दफ्तर से निकला तो बारिश शुरू हो गई...लेकिन अच्छा हुआ कि हमारे एक सीनियर जो मेरे साथ ही नाइट शिफ्ट में नौकरी करते हैं...ने हमें अपनी कार में चलने का ऑफर दे दिया.....कार में हम कुल मिलाकर पांच लोग थे..तीन तो हम यानी मैं विकास और रणविजय..और दो हमारे सीनियर...कार में कुछ दूर चलने के बाद सिचुएशन ऐसी बनी की रणविजय ने हम सभी को पार्टी देने का ऑफर दे दिया....बाहर बारिश और तेज हो चली थी..हम रिंगरोड से मेडिकल की ओर बढ़ रहे थे...कार की ब्रेक जहां लगी...मेकडोनाल्ड का पीला वाला स्टायलिश M दिखाई दिया...मैं भी विकास और रणविजय के साथ अंदर दाखिल हो गया...काउंटर पर पहुंचते ही एक सुन्दरी ने मुस्कुराकर हमलोगों का स्वागत किया..लेकिन वो बिल्कुल प्रोफेशनल था.. इसलिए ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं थी...विकास ने बर्गर ऑर्डर किया...और कोलड्रिंक भी...बर्गर की कीमत सुनकर ही कोलड्रिंक की प्यास मिट गई....पैसे मेरे जेब से भले ना गये हों...लेकिन मन जरूर भारी हो रहा था...मैं अपराध बोध महसूस करने लगा...खुद को कोसने भी लगा कि क्यों आ धमका... वैसी जगह जो मेरी लिए नहीं थी..हमें यकीन नहीं हो रहा था कि हम उसी देश में थे जहां की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रूपया से कम पर गुजारा करती है..मैकडोनाल्ड से निकलने के बाद बर्गर के स्वाद ने जरूर मन की करवाहट को थोड़ा दूर किया...लेकिन अगर लंबे समय तक इस दुर्घटना को याद रखूंगा तो सिर्फ 85 रूपये के बर्गर के लिए.....
दफ्तर से निकला तो बारिश शुरू हो गई...लेकिन अच्छा हुआ कि हमारे एक सीनियर जो मेरे साथ ही नाइट शिफ्ट में नौकरी करते हैं...ने हमें अपनी कार में चलने का ऑफर दे दिया.....कार में हम कुल मिलाकर पांच लोग थे..तीन तो हम यानी मैं विकास और रणविजय..और दो हमारे सीनियर...कार में कुछ दूर चलने के बाद सिचुएशन ऐसी बनी की रणविजय ने हम सभी को पार्टी देने का ऑफर दे दिया....बाहर बारिश और तेज हो चली थी..हम रिंगरोड से मेडिकल की ओर बढ़ रहे थे...कार की ब्रेक जहां लगी...मेकडोनाल्ड का पीला वाला स्टायलिश M दिखाई दिया...मैं भी विकास और रणविजय के साथ अंदर दाखिल हो गया...काउंटर पर पहुंचते ही एक सुन्दरी ने मुस्कुराकर हमलोगों का स्वागत किया..लेकिन वो बिल्कुल प्रोफेशनल था.. इसलिए ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं थी...विकास ने बर्गर ऑर्डर किया...और कोलड्रिंक भी...बर्गर की कीमत सुनकर ही कोलड्रिंक की प्यास मिट गई....पैसे मेरे जेब से भले ना गये हों...लेकिन मन जरूर भारी हो रहा था...मैं अपराध बोध महसूस करने लगा...खुद को कोसने भी लगा कि क्यों आ धमका... वैसी जगह जो मेरी लिए नहीं थी..हमें यकीन नहीं हो रहा था कि हम उसी देश में थे जहां की 77 फीसदी आबादी रोजाना 20 रूपया से कम पर गुजारा करती है..मैकडोनाल्ड से निकलने के बाद बर्गर के स्वाद ने जरूर मन की करवाहट को थोड़ा दूर किया...लेकिन अगर लंबे समय तक इस दुर्घटना को याद रखूंगा तो सिर्फ 85 रूपये के बर्गर के लिए.....
Friday, July 2, 2010
मासूम मासूमियत भरी
संडे नाइट में ड्यूटी थी...सुबह से घर पर ही था...पिछली रात पार्टी के बाद थोड़ी सुस्ती थी....दोस्तों में संतोष और हेमंत ही थे....पवन रोज की तरह लेपटॉप पर व्यस्त था...पेपर पढ़ते हुए दोस्तों से बात भी हो रही थी...साथ ही खाना बनाने की प्लानिंग भी....लेकिन कोई भी जल्दी खाने को तैयार नहीं था..शायद पिछली रात की पार्टी का असर गया नहीं था....हेमंत थोड़ा विचलित लग रहा था..और बार-बार बदरपुर जाने की जिद कर रहा था...लेकिन संतोष बिल्कुल संतोषी बना आराम से दीवाल को सजा रहा था...क्योंकि कल उसे ये मौका नहीं मिला था..वो पार्टी में देर से आया था....उसके चार बजे तक आ जाने की उम्मीद थी लेकिन स्वतंत्रता सेनानी ने उसे ये मौका नहीं दिया.....पार्टी बर्थ-डे का था...लेकिन हम लोगों में से किसी का बर्थ-डे नहीं था..असल में बर्थ-डे हमारी फ्रेंड का था....बातों बातों में हमलोगों ने खाना भी खा लिया...फिर भी शाम होने में काफी समय शेष था...मैंने फिल्म देखने की इच्छा बतायी...संतोष भी तैयार हो गया....ज्यादा सोचविचार करने की जरूरत नहीं पड़ी...पहले से ही मासूम देखने की सोच रहा था...कुछ देर बाद हमलोग टैपटॉप से चिपक गये...माहौल बहुत ही हल्का...हल्का इसलिए कि बैठने में कोई शिष्टाचार नहीं था...हां फिल्म देखने में जरूर गंभीरता थी...फिल्म शुरू हुई और कब हम सभी उसमें पूरी तरह डूब गये पता नहीं चला....फिल्म का हर पक्ष लाजवाब लगा..कहानी दबरदस्त संगीत बेजोड़,अभिनय दमदार यानी भरपूर मनोरंजन..यहां भरपुर मनोरंजन कहना आपको खटक सकता है...क्योंकि आपको लगेगा कि मासूम तो एक गंभीर विषय की फिल्म है...तो इसमें मनोरंजन कैसा ? तो मैं कहुंगा मनोरंजन केवल कॉमेडी एक्शन और प्रेम कहानियों में नहीं होता.....फिल्म में पूरी तरह डूब चुका था...कहानी और पात्र की संवेदनाओं ने मुझे पूरी तरह जकड़ लिया था...बीच-बीच में दोस्तों की कंपनी में जबरदस्ती हंसी आती लेकिन वो टिक नहीं पाती थी....महीनों बाद एक अच्छी फिल्म देख रहा था....मैं चाहुंगा कि ये फिल्म आप सभी जरूर देखें....शेखर कपुर ने शबाना आजमी और नसीरूद्दीन शाह को लेकर एक अच्छी फिल्म बनाई है...इसमें बाल कलाकार के रूप में उर्मिला और युगल हंसराज ने काम किया है....कम पात्रों और कम लागत में बेहतरीन फिल्म है....-- Akash Kumar sigh--
Wednesday, June 30, 2010
मजबुरी...
कई दिनों से सोच रहा हूं कि पूंछू तुमसे एक सवाल.....सवाल नहीं कोई नया, अनोखा...जिसपे तुम भी करो सवाल....नहीं सवाल ये जटिल जरूरी....पर मत समझों गैरजरूरी....किया सवाल तो जवाब भी चाहुं...नहीं मिला तो क्या मैं जानूं...क्या मैं जानूं क्या मैं मानूं.....कर सकता हूं जो मै ठानूं ....हो गयी बहुत बेकार की बातें....कर लें थोड़ी काम की बातें.....काम की बात जरूरी होता....जिसको करना मजबूरी होता....मजबूरी भी अच्छा होता...
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