Saturday, February 11, 2012
बिग बी का जादू....
फिल्में किसी और हीरो की होती तो सो भी जाता था..लेकिन अमित जी की फिल्मों को छोड़ना रात को बर्बाद करने जैसा होता था..क्योंकि जैसे ही फिल्म का कोई डायलॉग सुनाई देता...मन एक बार फिर से नियम तोड़ने के लिए उकसाने लगता..उसके बाद जो जद्दोजहत होती उसमें जीत अमित जी की होती थी...अब इसे अमित जी बेजोड़ डायलॉग डिलीवरी कहे या अभिनय की अमिट छाप...लेकिन कुछ तो था जो मुझे मजबूर करता था...
Sunday, January 22, 2012
हसरत ना रही मेरे दिल की.....
हसरत ना रही मेरे दिल की रहूं दिल्ली में कुछ और साल....
यकीन मानिए दिल्ली से दिल भर गया है...दिल्ली में 5 साल बिताने के बाद भी दिल्ली रास नहीं आ रही...अब सोचता हूं गांव लौट जाऊं....लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं....ना मेरे परिवार वाले और ना ही मेरे दोस्त...सिर्फ मेरे चाहने से भी संभव हो सकता है...बशर्ते कोई फुलप्रूफ प्लान हो...अगर मैं कहूं कि मेरे पास एक फुलप्रूफ प्लान है...तो क्या मेरे प्लान से मेरे मात-पिता राजी होंगे...शायद नहीं
क्योंकि वहां रहनेवालों के करामात वे लोग देख चुके हैं....फिर क्या मुझे ये ख्याल अपने मन से निकाल देना चाहिए...हरगीज नहीं....लौटना तो गांव में ही है....आज नहीं तो कुछ साल बाद सही....
तो क्या मुझे अभी कुछ दिन और मन मारकर रहना पड़ेगा...हां बेशक...और चारा भी क्या है ?
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जितने दिन यहां रहने हैं...जोश के साथ जिंदगी को जिते हुए रहें
क्यों नहीं हो सकता ?...बस दिल से कुछ चीजों को निकालना होगा...जो हमें परेशान करते हैं...कुछ चीजों से आंख फेर लेना होगा...जो मन को कचोटते हैं....फिर आराम से जी सकते हैं....क्या सचमुच ऐसा है?
नहीं ऐसा नहीं है....फिर देवसाहब के उस गीत का क्या....मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया….
क्या ये हालात के साथ समझौता नहीं होगा?...
Wednesday, January 18, 2012
फिर बंधी आशा....
Friday, December 30, 2011
कुछ खोया कुछ पाया...
अप्रैल का महीना आते ही एक और बड़ी घटना हम सभी का इंतजार कर रहा था....और वो था भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के लिए सरकार से लड़ाई...समाजसेवी अन्ना हजारे ने जनलोकपाल के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन किया...अनशन को देशभर में जबर्दस्त समर्थन मिला...ऐसा लगने लगा सरकार सशक्त लोकपाल के लिए मान जाएगी....उसके बाद बैठकों का कई दौर चला...लेकिन बात नहीं बनी और मामला फंसता गया...अन्ना हजारे ने रामलीला मैदान में एक बार फिर से हुंकार भरी...दिल्ली में विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ा...साथ ही देशभर में मैं हूं अन्ना के शोर सुनाई देने लगे....इस जनसैलाब से सरकार घबड़ा गई...इस बार सरकार ने बकायदा लिखित आश्वासन दिया...शीतकालिन सत्र में लोकपाल बिल पास कराने का....इसी दौरान अन्ना ने जंतर मंतर पर एक दिन का अनशन किया...जो लोकपाल पर खुली बहस के लिए था...अन्ना ने मुंबई में भी तीन दिन के अनशन का एलान किया...लेकिन स्वास्थ्य कारणों से इसे दूसरे दिन ही रोकना पड़ा....उधर सरकार ने अपना एक लोकपाल बिल तैयार कर लिया...उसे लोकसभा में पास भी करा लिया...लेकिन बिल राज्यसभा में लटक गया....यानी जो सरकार चाहती थी वही हुआ...
इसी साल हमें कुछ ऐसे लोगों ने अलविदा कहा...जिनकी यादें जिनके काम हमेशा उनकी मौजूदगी का एहसास कराती रहेगी...उन्हीं नामों में एक नाम है देव साहब का...जो हमें 3 दिसंबर को छोड़कर चले गए...लेकिन उनकी जिंदादिली हमारी जिंदगी में हमेशा उर्जा भरती रहेगी...यकीनन देव साहब ने राजू गाइड के रूप में जो हमें रास्ता दिखाया...उस रास्ते पर चलना हर एक के बस की बात नहीं है....
Thursday, December 29, 2011
बाद में क्यों पहले क्यों नहीं ?
टीम इंडिया का इस तरह लड़खड़ाना कोई नई बात नहीं है…और जब दौरा विदेश का हो तो ये और भी आम बात लगती है...लेकिन जब कोई अपनी पिछली गलतियों से भी सीख नहीं ले तो ये बात जरूर खटकती है....आखिर हम कबतक तेज उछाल वाली पिच की बात करके मन मसोसते रहेंगे...क्यों हमारे खिलाड़ियों के लिए वैसी पिचे तैयार नहीं की जाती..क्यों बोर्ड ऐसी पिचों पर बल्लेबाजी के लिए खास प्रैक्टिस की व्यवस्था नहीं कराती...ये एक अलग मुद्दा है जो मेलबर्न जैसी ऐसी हर हार के बाद उठती है...लेकिन हमें तो हैरानी इस बात की होती है कि हमारी बल्लेबाजी क्रम को दुनिया की सबसे धांसू बल्लेबाजी मानी जाती है...फिर ये बल्लेबाजी ताश के पत्ते की तरह क्यों धाराशाई हो जाती है...
जब ये सीरीज शुरू हुआ था तो हम ऑस्ट्रेलियाई टीम को कमजोर मान के चल रहे थे...खुद ऑस्ट्रेलिया के ही पूर्व खिलाड़ियों ने भी माना कि भारत के पास इस सीरीज को जीतने का बहुत अच्छा मौका है...लेकिन पहले टेस्ट में नतीजा कुछ औऱ निकला..हम मेलबर्न टेस्ट हार गए वो भी बुरी तरह..हमारे जिन गेंदबाजों की कहीं चर्चा नहीं होती उन्होंने कमाल कर दिया...हमारे गेंदबाजों ने एक अच्छा प्लेटफॉर्म तैयार करके दिया... जहां से हम जीत सकते थे...लेकिन ऐसा नहीं हुआ...क्योंकि हमारी टीम तो हमेशा से वापसी करने में विश्वास रखती है...एक बड़ी हार के बाद टीम का कैप्टन कहता है कि खेल अभी खत्म नहीं हुआ है..हम वापसी करने का माद्दा रखते हैं....ऐसा नहीं है कि हम वापसी नहीं कर सकते..या हमने वापसी नहीं की है...लेकिन सवाल है कि हम पहले से ही शिकंजा क्यों नहीं टाईट करके रखें..जिससे विरोधी टीम में खलबली मच जाए....
Saturday, December 10, 2011
सरकार की जिद या जनता की मजबूरी
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 11 दिसंबर को एक दिन का धरना….अन्ना की माने तो ये सांकेतिक धरना है...जो सरकार को ये बताएगा कि...अगर सरकार ने शीतकालिन सत्र में जनलोकपाल बिल को पास नहीं किया....तो देश की जनता 27 दिसंबर से दिल्ली के ही रामलीला मैदान में आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार है...16 अगस्त को रामलीला मैदान में अन्ना ने अनशन किया था...अनशन पर देशभर से अपार जनसमर्थन मिला...सरकार के हाथ-पांव कांपने लगे...विपक्षी दलों ने भी सरकार पर हल्ला बोल दिया...मीडिया में सरकार की फजीहत होने लगी...सरकार ने अन्ना हजारे के तीन मांगों को मान लिया..विलास राव देशमुख ने सरकार का लिखित फरमान रामलीला मैदान के मंच से पढ़कर सुनाया...तब अन्ना ने अपना अनशन तोड़ दिया..लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का आश्वासन दिया...सरकार और टीम अन्ना के बीच कई बैठकें हुई...लेकिन दोनों के बीच आपसी सहमति नहीं बन पाई...इन्ही बैठकों में स्टैंडिंग कमेटी ने रिपोर्ट तैयार कर संसद में पेश कर दी...स्टैंडिंग कमेटी के 28 सदस्यों में से 17 ने रिपोर्ट को गलत बताया...और विरोध किया...बावजूद इसके रिपोर्ट को संसद में पेश कर दिया गया...जिसमें ग्रुप सी के कर्माचारियों और सीबीआई को मसौदे से बाहर रखा गया...प्रधानमंत्री को इसके दायरे में लाने के फैसले को संसद पर छोड़ दिया गया...स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष अभिषेक मनु सिंघवी के इस रिपोर्ट के विरोध में फिर से जंतर-मंतर पर एक दिन का धरना दिया गया...
आखिर सरकार क्या चाहती है ये सरकार ही जानती है...लेकिन सरकार ये जानने की कोशिश क्यों नहीं करती कि जनता क्या चाहती है...सरकार ये मानती है कि अन्ना के साथ कुछ मुट्ठीभर लोग हैं...और सिर्फ मुट्ठीभर लोगों की बात को सरकार कैसे मान ले...अब ये सरकार को कौन समझाए कि देश की पूरी जनता जंतर-मंतर या रामलीला मैदान में इकट्ठा नहीं हो सकती...दूसरी बात देश में कुछ बेईमानों को छोड़ दें को कौन चाहेगा कि देश में भ्रष्टाचार रहे...और अब जब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए ये सारी कवायद की जा रही है...तो सरकार को ये बात क्यों समझ नहीं आती ?...
Monday, November 14, 2011
मुझे भी गुस्सा आता है...
राहुल गांधी को यूपी में जाने पर गुस्सा आता है….क्योंकि यूपी इस समय सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है....इसलिए नहीं कि वहां विकास नहीं हुआ है...भ्रष्टाचार का बोलबाला है...अपराधी बेलगाम हो चुके हैं...रोजगार के अच्छे विकल्प नहीं है....बल्कि इसलिए कि वहां विधानसभा चुनाव होने वाला है...इसलिए सत्ता के बाहर के तमाम राजनीतिक पार्टियों को ऐसा लगता है कि यूपी का हाल बेहाल है....एक पल के लिए राजनीतिक पार्टियों की बातों को सच मान भी ले तो एक सवाल उठता है कि जब राज्य में चुनाव नहीं होते ...तो क्यों ये बदहाली उनको नजर नहीं आती ? ऐसा में राहुल कहते हैं कि उनको यूपी का गुस्सा देखकर गुस्सा आता है...तो मैं कहना चाहुंगा कि जब महंगाई की मार देश की जनता पर पड़ती है..पेट्रोल के दाम में बेतहासा वृद्धि होती है...सरकार में शामिल मंत्री करोड़ों रूपये गबन कर जाते हैं...तब राहुल को गुस्सा क्यों नहीं आता ?
हमारे नेताओं के ऐसे बयान से मुझे भी गुस्सा आता है जब हमारे देश के जिम्मेदार नेता सच से मुंह मोड़कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की कोशिश करते हैं.....एक बात यहां क्लीयर कर देना चाहता हूं कि मैं यूपी के विकास को कोई सर्टिफिकेट नहीं दे रहा...सिर्फ इस सवाल का जवाब चाहता हूं कि किसी राज्य की बदहाली हमारे नेताओं को चुनाव के आने पर ही क्यों दिखाई देता है...क्या इसलिए कि वे आज भी मानते हैं कि अपनी चिकनी चुपड़ी भाषणों से जनता को बड़गला सकते हैं...हमारे नेता आज भी अगर ऐसा मानते हैं तो बिहार और प. बंगाल के विधानसभा चुनाव से सबक लेना चाहिए...जहां लोगों ने नेताओं की बातों में आए बगैर विकास के लिए वोट दिया...और उसका असर वहां दिखाई दे रहा है...